गद्य- प्रियतम ©रानी श्री
नमन, माँ शारदे
नमन लेखनी
प्रियतम,
हम तो इस संसार में नहीं हैं किंतु कण-कण में बसा हमारा अमरप्रेम आज भी यहां गुंजायमान है।
स्मरण में है क्या,
जिस क्षण हमारा प्रथम मिलन हुआ था व जिस क्षण आप पर दृष्टि पड़ते ही मेरी सृष्टि में प्रेम तरंग की वृष्टि हुई थी। कितना असीम अनुभवपूर्ण क्षण था, जब आपके पग मेरी ओर बढ़े थे। मेरे आंतरिक व बाह्य तंत्र व तंत्रिकाएं तो शिथिल पड़ गये। किंचित ही संभव हो जब एक मनुष्य मेरे इतने निकट आया और मेरा हृदय स्पंदन तीव्रतम सीमा पर जा पहुंचा, इश्वर जाने मैं क्यों थर्रा उठी और स्वेद पूर्ण हो गयी। दर्शित नहीं हुआ होगा किंतु मेरी दशा केवल मुझे ज्ञात है। मस्तिष्क शून्य हो कर भी कोलाहल से पूर्ण था। प्रथम दृष्टि का अनुराग संभवतः इसी प्रकार को होता होगा।
नवयौवन की सरिता के तट पर खड़े आप, अपने श्याम व मनमोहक वर्ण, मखमल कपोल, तिस पर चंचल चतुर तीक्ष्ण नयनों से जब मेरी ओर सम्मुख हुए, अंबर की समस्त तड़ितों ने हृदय पर त्वरित कड़े आघात कर दिए। निस्संदेह प्रतीत नहीं हुआ किंतु जो व्यतीत हुआ वही तो जीवन गीत हुआ। आपके पंकज समान ओष्ठ से बाहर निकली माधुर्य से लथपथ वो कर्णप्रिय लावण्यमयी वाणियां, जिन्होंने मेरी वाणी को संपूर्ण रूपेण क्षीण कर दिया। कस्तूरी मृग से भी अधिक सुगंधित आपका सुगंध था। इश्वर ने समस्त सर्वश्रेष्ठता आपमें ही दी थी । प्रकृति ने समस्त प्रयत्न कर दिये हमारे संगम के लिये। गृह की ओर गमन करने के क्रम में मेरे नयनों में आपका चित्र, मस्तिष्क में आपका चरित्र, हृदय में आपके विचार व वार्तालापों में स्वयं आपने अधिकार कर लिया था। क्या कदापि ऐसा होगा कि इस युवती के जीवन पर भी केवल आपका आधिपत्य हो जाए।
और जब बहुत दिवसों पश्चात बिन औपचारिकता के मैंने प्रेम की बात कही तब आप शांत हो गये थे। और आपकी मुस्कान से इस रहस्य को मैंने भी समझा कि मैं भी आपको प्रिय हूं। तत्पश्चात तो मानों मेरा संपूर्ण जगत आपमें सन्निहित हो कर रह गया।
दिवस तो अनुरूप अनुकूल थे किंतु ये बैरन रात्रि हमारे विरहा काल को कितना बढ़ा देती थी। प्रतीक्षारत दो प्रेमीयुगल और उनकी आत्माएं किस प्रकार व्याकुल हो उठती थीं। चंद्रमां का प्रेमी चकोर पक्षी विरहा गीत गाता था। वो कालक्रम भी अत्यंत अभूतपूर्व सम था। हर पहर के प्रेम की साक्षियां ये पंचतत्व क्षिति जल पावक गगन समीर होते थे, जब हम समीप होते थे। जब निकटतम सीमा होती थी दो कायाओं की तब स्पंदन की गतियां स्पष्ट सुनाई पड़ती थीं। आपके प्रेम वात्सल्य से विभोर हो कर मुझे समस्त सुख मिल जाता था।
प्रेम शब्द सुना था किंतु उसकी परिभाषा व अर्थ आपके प्रेम ने दिखाई, समझाई व अनुभव कराई थीं। वास्तविक रूप में प्रेम किसे कहते हैं ये आपसे ज्ञात हुआ। काल की भांति ही हमारा प्रेम काल भी प्रगति पथ पर अग्रसरित होता ही रहा। प्रेमालिंगन तो मानों सुरक्षा कवच का कार्य करते थे। और ललाटों पर जब आपके ओष्ठ स्पर्श का अनुभव होता था तो प्रतीत होता था कि मुझसे अधिक भाग्यशाली स्वयं सौभाग्य भी न हो।
और चरम व परम सुख तो पराकाष्ठा पर तब होता था जब आपके मुख कमलों से मेरा ये साधारण सा नाम सुसज्जित हो जाता था। और आपका विशेष तरीके से मुझे 'प्रियतमा' कहना तो मानों क्या ही था। मैंने कभी स्वयं को आभूषणों से सुसज्जित या अलंकृत नहीं किया क्योंकि मेरे जीवन रूपी काया में आपने स्वयं का अलंकार इतने अद्वितीय रूप में किया कि उसके समक्ष सभी प्रकाशपुंज, किरणें, रश्मियां यहां तक की दिवाकर व शशि की चमक भी लघु हो जाए। आपसे मेरी काया की समस्त आभाएं हैं। मैं पूर्वजन्म से लेकर पाश्चात जन्म तक केवल आपकी हूं। हे प्राणनाथ, ये तो स्मृतियां हैं किंतु शीघ्र ही शारीरिक रूप में आपसे मिलूंगी।
हे प्राणप्रिय,
शीघ्र मिलाप होगा न !
हां प्रियतमे, आगामी अवतरण में।
हम प्रतीक्षारत हैं पुनः प्रेमगाथा लिखने को।
हम भी...
©रानी श्री
अत्यंत भावपूर्ण एवं हृदयस्पर्शी गद्य 💐
जवाब देंहटाएंभावपूर्ण अभिलेख 🙏🍃
जवाब देंहटाएंअत्यंत हृदयस्पर्शी
जवाब देंहटाएंभावपूर्ण और हृदयस्पर्शी सृजन ❤️🙏
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