गोपी छंद- शिव शंकर ©रजनीश सोनी

नमन, माँ शारदे

नमन, लेखनी

गोपी छंद  (आरती  जय शिवशंकर की) 

15 मात्रिक छंद, आदि त्रिकल, अंत गुरु। 



आरती  जय शिव शंकर  की। 

          स्वयंभू श्रृष्टि सृजनकर की।। 


श्रृंग   कैलाश    निवासी  की। 

जगत शिव पर विस्वासी की।। 

वसन    बाघंबर   वाले   की।

डमाडम   डमरू  वाले  की।। 

आरती जय शिव शंकर  की। 

          स्वयंभू  श्रृष्टि सृजनकर की।। 


जयति  जै  जै  त्रिनेत्र धारी।

चन्द्रिका  माथ  लगे प्यारी।। 

जटा   शुचि   गंगाधारी की।

जयति  नन्दी असवारी की।। 

आरती जय शिव शंकर की। 

          स्वयंभू श्रृष्टि सृजनकर की।। 


कर्ण  वृश्चिक   कुंडल  सोहे। 

माथ   चंदन   त्रिपुंड   मोहे।। 

फवे   गलहार   भुजंगा  की। 

देह  भर  भस्म  अनंगा  की।। 

आरती जय शिव शंकर  की। 

          स्वयंभू श्रृष्टि सृजनकर की।। 


सदा   वामाङ्ग    योगमाया। 

इन्हीं के कारण जग भाया।। 

जगत  भूतादिक  संगा की। 

मगन मन  भंग तरङ्गा  की।। 

आरती जय शिव शंकर की। 

            स्वयंभू श्रृष्टि सृजनकर की।। 


©रजनीश सोनी शहडोल


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