ग़ज़ल ©अंजलि

 नमन मां शारदे

नमन लेखनी



ज़माने की भी अलग ही रवायत है

सब कुछ है  फिर भी शिकायत है।


ज़रा संभल कर रहो इस ज़माने में,

हुकुम नहीं साहब बस हिदायत है।


दुनिया की भीड़ में वो साया अपना

माँ महज़ एक शब्द नहीं इनायत है।


भरे जो पेट, अपना पसीना बहाकर,

मिलती उसे ब्याज  पर रिआयत है।


ढूँढ लेता ज़माना छिपी कमियाँ भी,

अजी  आदत नहीं ये तो  वसायत है।


©अंजलि 


टिप्पणियाँ

  1. माँ महज एक शब्द नहीं इनायत है.....वाहहहह वाहहहह वाहहहह बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल दीदी 🙏🍃

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  2. वाह, बहुत ही बेहतरीन रचना 👌👌👏👏

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  3. बहुत बेहतरीन ग़ज़ल दीदी🙏

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