गीत- प्रसून ©लवी द्विवेदी 'संज्ञा'

नमन, माँ शारदे

नमन लेखनी



मैं प्रेम में रँगी हुई फिरूँ,

तू प्रेम को नकारता फिरे।

मैं प्रेम भाव वारती फिरूँ,

तू भाव खाय भागता फिरे।


मिलिंद रूप व्यग्र गोपिका,

प्रसून श्याम रंग ढूँढती,

अरण्य पूर्ण खोज, हारकर,

शिथिल पड़ी, धरा टटोलती।

मैं आस जो समेटती फिरूँ,

तू आस वो कचोटता फिरे।


अनेक पुष्प जोह जोहकर,

मालिका बनाई नेह की।

परन्तु रे कठोर क्यों कभी,

डेहरी न लाँघी गेह की।

मैं द्वार नित बटोरती फिरूँ,

तू नित कषाय फेंकता फिरे।


कैसी है विडंबना किशन,

माँग मेरी पूरी न करे।

नाम है हरी परन्तु क्यों,

अपनी प्यास को भी न हरे।

मैं प्रेमपात्र माँगती फिरूँ,

तू प्रेम पात्र ढूँढता फिरे।

©लवी द्विवेदी 'संज्ञा'

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