उठ के देख सकारे ©आशीष हरीराम नेमा

 सूर्य उदित होने से पहले जगमग हों जब तारे ।

तब बरसाता सुधा सुधाकर दृश्य मनोरम प्यारे ।।

।।रे साधु उठ के देख सकारे ।।


पहर ये चौथा शुभ फलदायी पुण्यकाल कहलाता ,

निशि वासर का सुखप्रद संगम अद्भुत छटा बनाता ।

मिटें निराशा के तम पाकर आशा के उजियारे ।।

।।रे साधु उठ के देख सकारे ।।


साधक साधे सिध्दि उठकर जोगी जोग रमाये ,

छात्र करें अध्ययन व सज्जन प्रभु में चित्त लगाये ।

प्राणायम करें जन नित तो वैद्य ना झाँके द्वारे ।।

।।रे साधु उठ के देख सकारे ।‌।


लगे मनोरम क्षितिज कि होवे जब ऊषा की वेला ,

पत्तों से मोती सम झरता तुहिन कणों का रेला ।

स्वयं प्रकृति अपनी छवि को तब अपने हाथ सँवारे ।‌।

।।रे साधु उठ के देख सकारे ।।


शीतल पवन के झोंके से तरु तज देते सुमनों को,

अरूणशिखा भी टेर जगाए बाकी सुप्त जनों को ।

कलरव करते पन्छी इत उत घूमें पंख पसारे ।।

।।रे साधु उठ के देख सकारे ।। 

      © आशीष हरीराम नेमा 

टिप्पणियाँ

  1. वाह वाह अतुल्य रचना, हार्दिक बधाई

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  2. वाह वाह अतुल्य रचना, हार्दिक बधाई

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  3. वाह वाह अतुल्य रचना, हार्दिक बधाई

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  4. अत्यंत मनमोहक एवं उत्कृष्ट सृजन 👌👌👌👏👏👏

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