तुमसे कभी हारा नहीं हूँ मैं ©परमानन्द भट्ट
हूँ अटल चट्टान सा गारा नहीं हूँ मैं
बारिशों तुमसे कभी हारा नहीं हूँ मैं
टूट कर बिखरा हुआ हूँ कांच के जैसे
एक टुकड़ा ही बचा सारा नहीं हूँ मैं
वक्त ने मुझको बदल के रख दिया साथी
ढूँढते हो आप वह यारा नहीं हूँ मैं
मै धधकता सूर्य हूँ यह याद रख लेना
टूटता है रोज वह तारा नहीं हूँ मैं
सिंधु ने खारा किया है स्वाद यह मेरा
मै नदी का नीर हूँ खारा नहीं हूँ मैं
आदमी की वेदना को व्यक्त मै करता
मात्र दृग से बह रहा धारा नहीं हूँ मैं
यह 'परम' तो रूह से संवाद को आता
सिर्फ तेरी देह का मारा नहीं हूँ मैं
© परमानन्द भट्ट
🙏👏👏👏बेहतरीन
जवाब देंहटाएंधन्यवाद जी
जवाब देंहटाएंधन्यवाद जी
जवाब देंहटाएंधन्यवाद जी
जवाब देंहटाएंWahh Sirji amazing ❤️
जवाब देंहटाएंबेहतरीन प्रभावशाली गज़ल 👌👌👌👏👏👏🙏
जवाब देंहटाएंउम्दा रचना 👏👏
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर 👌🏼🙏🏻
जवाब देंहटाएंखूबसूरत 🙏
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