संदेश

कविता- गणतंत्र ©संजीव शुक्ला 'रिक्त'

नमन माँ शारदे नमन ,लेखनी  जागो प्रिय ! स्वागत करो उठो ,  गणतंत्र द्वार पर आया है l बाहें पसार सत्कार करो,  जननी ने तुम्हे बुलाया है l नव स्वर्ण रश्मियाँ वृक्ष शीर्ष, उद्यान पुहुप नव कुसमित हैँ l किसलय सर-सर, मृदु मंगल स्वर,  वन लता कुंज अति हर्षित हैँ l खग कलरव मंगल गान मुदित,  सरि कल-कल धारा का गायन l नव पल्लव तोरण द्वार सजे,  अलि का अभिनंदन गुंजायन l लोहित मनहर पूरब लाली,  रवि प्रथम किरण स्वागत पग-पग l निर्झर उच्छृंखल मुदित नाद,  तृण शीर्ष तुहिन मुक्ता जगमग l उत्साहित पवन झकोर मंद,  द्रुम दल के संग किलोल करें l सुरभित झोंके चंदन वन के,  कण-कण में मृदुल सुगंध भरें l खेतोँ की हरियाली, कछार,  बस्ती, गलियाँ,  चौबारों में  l उत्साह पर्व का छाया है,  घर-घर, आँगन, ओसारों में l सज तीन रंग की चूनर में,  जननी हर्षित मुस्काती है l हिमगिरि किरीट मस्तक सोहे,  पग सिंधु लहर धो जाती है l यह पुण्य,देव दुर्लभ धरती,  आओ हम सौ-सौ नमन करें l इस पावन चंदन माटी को, गर्वित हों सादर शीश धरें l बलिदान प्राण कर जिन वीरों, ...

मनहरण घनाक्षरी - पराक्रम दिवस ©रजनीश सोनी

वन्दे वागेश्वरी नमन लेखनी  (1)  दशा  देख  भारत  की,                  मन अकुलाया होगा,  प्रज्ज्वलित  हिय  ज्वाल,                 वह  कोई  खास  था। किसी  एक  क्षेत्र से न,                  रहा  सरोकार  उन्हे,  उनके तो  दिल  में  ही,                    भारत   निवास  था। मातृभूमि   अनुरक्ति,                प्रबल थी  इच्छा शक्ति, होगा  ही  विमुक्त  देश,                 अटल    विश्वास   था  साहस  अदम्य  लिये,                वैचारिक  क्रांति लिये,  आया  महानायक जो,         ...

गीत- कविताएँ ©रजनीश सोनी

वन्दे वागेश्वरी नमन लेखनी  धूमिल  जीवन  में  नवरस  भर  देती हैं, कविताएँ  मुझको  जीवित  कर देती हैं। अक्षर के अक्षत  अर्पित कर  सुख पाते।  चिन्तन करते शब्द जाल को सुलझाते।।  जैसे - तैसे  छोर मिला  कुछ सुलझा तो,  नई  सोच को  फिर  लाकर  धर देती हैं।  कविताएँ  मुझको  जीवित  कर देती हैं।।  व्यथा कथा उत्पीड़न संशय की दुविधा।  श्रम संयम सानिध्य शौर्य सेवा सुविधा।। दयाभाव  शृंगार  स्नेह  करुणा  चिन्ता,  विविध  भाव को  रहने को  घर देती हैं।  कविताएँ  मुझको  जीवित  कर देती हैं।।  नैन पनारे  क्यों निकले, था क्या बोया।  जीवन  के  झंझावातों में  क्या खोया।।  जटिल प्रश्न जब घेरें तो  कोशिश करके,  सब  प्रश्नों  का   वाजिब  उत्तर  देती हैं।  कविताएँ  मुझको  जीवित कर देती हैं।।  छंद ताल गति लय शब्दों की सार्थकता।  वर्...

दोधक छंद- विवाहोत्सव ©ऋषभ दिव्येन्द्र

आप सभी को लेखनी परिवार की ओर से विवाह पंचमी की असंख्य शुभकामनाएँ। प्रभु श्री राम और माता जानकी कृपा दृष्टि बनाये रखें। नमन माँ शारदे नमन लेखनी छन्द– दोधक विधान- ३ भगण+२ गुरु (SII SII SII SS) ‎ ‎राम सिया छवि भावन न्यारी। ‎सुन्दर रूप सुहावन प्यारी।। ‎साँवर राम सिया बड़ गोरी। ‎पा न सकी उपमा मति मोरी।। ‎ ‎मध्य सभा सिय राम विराजे। ‎मोहक वाद्य लुभावन बाजे।। ‎ आलि सुमंगल गीत सुनाये। ‎मंजुल कोकिल कंठ लजाये।। ‎ ‎मोह रहा यह रूप सलोना। ‎हर्षित है हिय का हर कोना।। ‎पण्डित पाठ करें हरषायें। ‎दोउ महीपति भी सुख पायें।। ‎ ‎मंडप राज रहे सब भाई। ‎चारण भाट सुमंगल गाई।। ‎कौशिक संग वशिष्ठ विराजे। ‎राज पुरोहित मंगल काजे।। ‎ ‎हर्षित हैं सिय मात सुनैना। ‎नेह भरी छवि दृष्टि चितैना।। ‎वेद पढ़ें सब पण्डित आए। ‎रूप मनोहर प्राण बसाए।। ‎ ‎वेद जिसे कह "नेति" बुलाये। वर्णन मूढ़ अबोध सुनाये।। ‎चित्त सदा छवि नाथ सुहाई। ‎दास करे विनती रघुराई।। ‎     दोहा ‎सीता के अपसव्य में, शोभित प्रभु श्रीराम। ‎संग सदा सौमित्र के, रहें उर्मिला वाम।। ‎ ‎मुदित मंगला मांडवी, मन्मथ भरत कुमार। ‎शत्रुहंत श्रुतकीर्ति के, बनें प्राण...

गीत- प्यास ©के एम "कौस्तुभ"

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी लोलुप मन तुमको समझाऊँ , मत प्याली विष ढार । तेरी प्यास न मिटने वाली , मिट जाए संसार । उदर दरी के वादे भूले,  जन्म लिया झूले में झूले। पुष्ट हुआ माया को बाँधे, मन मचला अब नभ को छूले । जोड़ रहा है पाई-पाई , यह नश्वर व्यापार ॥ 1 ॥     हर पल केवल पाप समेटा , अंत चिता पर जाकर लेटा । तेरे-मेरे  के   घेरे   में , फँसकर इस जीवन को मेटा । जो बोया है मिल जायेगा , रहता नहीं उधार ॥ 2 ॥ सोच अभी भी प्रभु चरनन की , नैया पार लगे जीवन की, पीछे तू कुछ कर नहिं पाये, जब पत्री आएगी यम की । जिन पर यह तन हवन किया क्या , ले जायेंगे पार ॥ 3 ॥ ©के एम "कौस्तुभ "

गीत- एकल ©लवी द्विवेदी

प्रेम का संगीत गाकर, नेह की वीणा बजाकर। प्राण में बसकर हमारे, क्या पता था, प्राण प्यारा प्राण लेगा।। मान ले यदि दोष मेरा,  तज चले, करके बसेरा।  किंतु एकल उस निलय को, देख बीहड़ क्यों बुहारा ? गेह स्मृतियां पुरानी,  थी अधूरी, पर कहानी। स्मरण करके कभी क्या,  अन्न ले करके पुकारा ? गुनगुनाता चहचहाता,  उड़ रहा था खग यहीं पर। दो दिवस बीते, नहीं वो.. दिख रहा क्यों, है कहीं, पर.... है कहाँ? यदि कर सके उपकार यह ना, खग वहाँ कैसे उड़ेगा ? प्राण में बसकर हमारे, क्या पता था, प्राण प्यारा प्राण लेगा।। नैन यदि शृंगार करके, रो पड़ें भी व्योम भरके। पीर जिनकी आपदा बन, आँधियाँ भी सींच सकती। मर्मभेदी यातनाएं,  शांत हिय की वेदनाएं। यदि हुई विकराल हिय में,  गर्जना को भींच सकती। दामिनी हिय की भड़क यदि,  जाए तो घबरा उठेंगे। दंभ रूपी वृक्ष जो ना.. झुक सकें वो भी झुकेंगे।  किंतु मन में मन दबाकर, मर रहा जो, चैन से क्या मर सकेगा ? प्राण में बसकर हमारे, क्या पता था, प्राण प्यारा प्राण लेगा। वक्ष ने विश्वास बोया, और फिर क्या क्या न खोया। प्रेम में परिहास बनकर, रह गया हर एक...

गीत- ज़ाफ़रानी ©संजीव शुक्ला "रिक्त"

नमन, माँ शारदे नमन,लेखनी  किसकी मिसाल दे दें  ,कोई न और सानी l  महका शबाब कोई  , शादाब ज़ाफ़रानी ll ये सुरमई निगाहें , चंदन शरीक बाहें , काली पलक घनेरी , क्या किस तरह सराहें l  कुदरत जिसे तराशे  , नायाब वो निशानी ll  दो सुर्ख़ लब तुम्हारे ,दहके हुए शरारे , खुशबू घुली रगों में  , गेसू जड़े सितारे l  ज़ुल्फ़ें बिखर गईं तो ,हैरान रात रानी ll  चंचल चनाब कोई ,या आफ़ताब कोई , लाखों धनक समेटे  ,रंगीन ख़्वाब कोईl उजली सहर तुम्ही से,हर रात है सुहानी ll है हर अदा निराली सूरत हसीन आली, रुख़सार पर शफ़क़ से,उतरी सुफैद लाली  l  जेसे ख़ुदा फलक पर ,लिख दे ग़ज़ल पुरानी ll ©संजीव शुक्ला "रिक्त"