सार छंद - अकिञ्चन विनय ©ऋषभ दिव्येन्द्र

नमन माँ शारदे

नमन लेखनी

छन्द- सार छंद (विषम पद मात्रिक छंद)

विधान-

मात्रा-२८, 

यति - १६,१२

चरणान्त - SS



‎दीन-हीन मैं नाथ अकिञ्चन, द्वार तुम्हारे आया।

‎आर्द्र नयन, आहत अन्तर्मन, पास तुम्हारे लाया।

‎तुम असीम, मैं बिन्दु मात्र हूँ,  तुम सागर मैं धारा।

‎मेरी लघुता को प्रभु अपना, दे दो अमित सहारा।।

‎पतझड़ में ज्यों सूखा पत्ता, सङ्ग पवन के बहता।

‎अन्तहीन सम मरुथल में मैं, अपनी पीड़ा सहता।।

‎तुम हो अडिग हिमालय स्वामी, मैं नगण्य रज कण हूँ।

‎तुम जीवन हो प्राण जगत के, मैं क्षणभङ्गुर क्षण हूँ।।

‎जैसे तृषित कपिञ्जल पाखी,  घन की राह निहारे।

‎वैसे  ही  दो  नयन  प्रतीक्षा,   करते   द्वार   तिहारे।।

‎काल-चक्र की द्रुत धारा में, तिनके सा बहता हूँ।

‎मौन व्यथा के कारागृह में, घुट-घुट कर रहता हूँ।।

‎शून्य  हृदय  के  इस  मरुधर  पर, करुणा-मेघ गिरा दो।

‎जनम-जनम की अमिट तृषा पर, कृपा कटाक्ष फिरा दो।।

‎मिटा सको तो मुझे मिटा दो, चाहे अंङ्क लगा लो।

‎शरणागत   हूँ   मेरे   भगवन्,  दुत्कारो-अपनालो।।

‎© ऋषभ दिव्येन्द्र

टिप्पणियाँ

  1. बहुत सुंदर , स्तुत्य छंदबद्ध सृजन।

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  2. बहुत-बहुत धन्यवाद और आभार लेखनी परिवार का 🤗🙏

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  3. उत्कृष्ट अभिव्यक्ति, बेहतरीन शब्द विन्यास ऋषभ जी 👌👌👍

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  4. वाह बहुत ही बढ़िया

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  5. उत्कृष्ट छंदबद्ध प्रार्थना

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  6. मर्मस्पर्शी भक्तिभाव से युक्त काव्य रचना ,जो ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का अहसास कराती है। बहुत सुंदर छंदबद्ध सृजन मित्रवर 👌🏻💐

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  7. अति श्रेष्ठ सृजन .. भावों को शब्दों के माध्यम से बहुत ही खूबसूरती से पिरोया ...
    शुभाशीष

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