गीत- घिरी बदरिया काली-काली ©ऋषभ दिव्येन्द्र

नमन माँ शारदे 

नमन लेखनी 


           घिरी बदरिया काली-काली!


तप्त धरा पर बनकर आँचल,

भरें  चौकड़ी  ये दल-के-दल,

मानो कोई हिरणी चलती, चाल चपल चंचल मतवाली!

            घिरी बदरिया काली-काली!


आतुर   भू  के   आलिङ्गन  को,

व्याकुल दिखते महि चुम्बन को,

झूम-झूम  के  रोर  मचाते, बरसावन  रसधार  निराली!

            घिरी बदरिया काली-काली!


श्याम   घनेरे  घन   बरसेंगे,

सब के सब सुख से सरसेंगे,

नीरस कण्ठ अधर मुरझाए, तृप्त कहो क्या होंगे आली?

            घिरी बदरिया काली-काली!


©ऋषभ दिव्येन्द्र


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