गीत- घिरी बदरिया काली-काली ©ऋषभ दिव्येन्द्र
नमन माँ शारदे
नमन लेखनी
घिरी बदरिया काली-काली!
तप्त धरा पर बनकर आँचल,
भरें चौकड़ी ये दल-के-दल,
मानो कोई हिरणी चलती, चाल चपल चंचल मतवाली!
घिरी बदरिया काली-काली!
आतुर भू के आलिङ्गन को,
व्याकुल दिखते महि चुम्बन को,
झूम-झूम के रोर मचाते, बरसावन रसधार निराली!
घिरी बदरिया काली-काली!
श्याम घनेरे घन बरसेंगे,
सब के सब सुख से सरसेंगे,
नीरस कण्ठ अधर मुरझाए, तृप्त कहो क्या होंगे आली?
घिरी बदरिया काली-काली!
©ऋषभ दिव्येन्द्र
उत्कृष्ट वर्षा गीत🙏सुंदर वर्णन
जवाब देंहटाएंउत्कृष्ट वर्षा ऋतु वर्णन का गीत ऋषभ जी🌹🌹
जवाब देंहटाएंसुन्दर भावों का गीत 💐
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