गीत- कविताएँ ©रजनीश सोनी

वन्दे वागेश्वरी

नमन लेखनी 


धूमिल  जीवन  में  नवरस  भर  देती हैं,

कविताएँ  मुझको  जीवित  कर देती हैं।


अक्षर के अक्षत  अर्पित कर  सुख पाते। 

चिन्तन करते शब्द जाल को सुलझाते।। 

जैसे - तैसे  छोर मिला  कुछ सुलझा तो, 

नई  सोच को  फिर  लाकर  धर देती हैं। 

कविताएँ  मुझको  जीवित  कर देती हैं।। 


व्यथा कथा उत्पीड़न संशय की दुविधा। 

श्रम संयम सानिध्य शौर्य सेवा सुविधा।।

दयाभाव  शृंगार  स्नेह  करुणा  चिन्ता, 

विविध  भाव को  रहने को  घर देती हैं। 

कविताएँ  मुझको  जीवित  कर देती हैं।। 


नैन पनारे  क्यों निकले, था क्या बोया। 

जीवन  के  झंझावातों में  क्या खोया।। 

जटिल प्रश्न जब घेरें तो  कोशिश करके, 

सब  प्रश्नों  का   वाजिब  उत्तर  देती हैं। 

कविताएँ  मुझको  जीवित कर देती हैं।। 


छंद ताल गति लय शब्दों की सार्थकता। 

वर्ण व्यवस्था  कलन  गेयता बोधकता।। 

वीणावादिनि वरदहस्त  जब सिर धरती, 

गेय काव्य बन  वाणी को  स्वर  देती हैं। 

कविताएँ  मुझको  जीवित कर देती हैं।। 


©रजनीश सोनी, शहडोल


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