निराशा ©ऋषभ दिव्येन्द्र


आशा दिखती चूर्ण, दिखे चहुँओर निराशा।

भरे हृदय बस आह, लुप्त सारी प्रत्याशा।।

उठती कितनी पीर, सुनो जब टूटे सपने।

छाये व्यथा अपार, लगे अन्तर्मन तपने।।


शिथिल-शिथिल सी श्वास, क्लांत-सी लगती काया।

तम का घन अम्बार, त्रास अंतस में छाया।।

एकाकी का भाव, समाहित जीवन कण में।

नित अनगिन अवरोध, दिखाई दे प्रतिक्षण में।।


©ऋषभ दिव्येन्द्र

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