मोहिनी ©विपिन बहार

विधा-गजल

वज़न-212,212,212,212


 नैन मादक लिए घूमती हो कहाँ ।

हम यहीं हैं सनम ढूँढती हो कहाँ ।।


ना समझ,ना बनो ,आज तो तुम जरा ।

चूमना था कहाँ चूमती हो कहाँ ।।


रात-रानी बनी राज करने लगी ।

अब पता दूसरा पूछती हो कहाँ  ।।


फोन को तोड़ने से हुआ क्या भला ।

टूटना था कहाँ टूटती हो कहाँ ।।


आग ही आग हैं जान चारों तरफ ।

बेवजह आग में कूदती हो कहाँ ।।

 

चाहकर भी नही भूल पाया सनम ।

बन गई लत सनम छूटती हो कहाँ ।।


 © विपिन"बहार"

         

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