मोहिनी ©विपिन बहार
विधा-गजल
वज़न-212,212,212,212
नैन मादक लिए घूमती हो कहाँ ।
हम यहीं हैं सनम ढूँढती हो कहाँ ।।
ना समझ,ना बनो ,आज तो तुम जरा ।
चूमना था कहाँ चूमती हो कहाँ ।।
रात-रानी बनी राज करने लगी ।
अब पता दूसरा पूछती हो कहाँ ।।
फोन को तोड़ने से हुआ क्या भला ।
टूटना था कहाँ टूटती हो कहाँ ।।
आग ही आग हैं जान चारों तरफ ।
बेवजह आग में कूदती हो कहाँ ।।
चाहकर भी नही भूल पाया सनम ।
बन गई लत सनम छूटती हो कहाँ ।।
© विपिन"बहार"
सूंदर👌👌
जवाब देंहटाएंआभार गुंजित👏
हटाएंWaah bhaiya ji 👌👌
जवाब देंहटाएंजी बेहद शुक्रिया आपका💐
हटाएंबहुत सुंदर 👌👌👌👏👏👏
जवाब देंहटाएंजी मैंम बेहद शुक्रिया आपका💐
हटाएंबहुत सुंदर 👏👏
जवाब देंहटाएंजी बेहद शुक्रिया आपका💐
हटाएंजी सर बेहद शुक्रिया आपका💐
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