शराबी ©विपिन बहार

 सड़क पर किनारे मचलता शराबी ।

बिना बात के अब उछलता शराबी ।।


किसी की नही है उसे फिक्र अब तो ।

कदम ही कदम पर बदलता शराबी ।।


गमो को उड़ाया नशे में मिलाकर ।

गमो के सहारे निखरता शराबी ।।


पता ही नही मिल रहा है निलय का ।

इधर से उधर अब भटकता शराबी ।।


करे पाँव डगमग अरे यार डगमग ।

यहाँ से वहाँ जब गुजरता शराबी ।।


टिका कौन हैं अब भला यार आगे ।

खुदी को बड़ा अब समझता शराबी ।।


सभी चुप रहे बस वही बोलता है ।

जरा भी नही अब ठहरता शराबी ।।


गजल-गीत गाने लगा यूँ सुहाने ।

नदी की लहर सा बहकता शराबी ।।


         © विपिन बहार

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