चंचल मन ©अनिता सुधीर

 चंचल मन को गूँथना

सबसे टेढ़ी खीर

**

घोड़े सरपट भागते

लेकर मन का चैन

आवाजाही त्रस्त हो

सुखद चाहती रैन

उछल कूद कर कोठरी

बनती आज प्रवीर।।

चंचल मन..


भाड़े का टट्टू समझ

कसते नहीं लगाम

इच्छा चाबुक मार के

करती काम तमाम

पुष्पित हो फिर इन्द्रियाँ

चाहें बड़ी लकीर।।

चंचल मन..


भरी कढ़ाही ओटती

तब जिह्वा का स्वाद

मंद आँच का तप करे

आहद अनहद नाद

लोक सभी तब तृप्त हो

सूत न खोए धीर।।

चंचल मन..


                    @अनिता सुधीर आख्या

टिप्पणियाँ

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  2. आप सभी का हृदयतल से धन्यवाद

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