मनहरण घनाक्षरी - पराक्रम दिवस ©रजनीश सोनी

वन्दे वागेश्वरी
नमन लेखनी 


(1) 
दशा  देख  भारत  की, 
                मन अकुलाया होगा, 
प्रज्ज्वलित  हिय  ज्वाल, 
               वह  कोई  खास  था।
किसी  एक  क्षेत्र से न, 
                रहा  सरोकार  उन्हे, 
उनके तो  दिल  में  ही,  
                 भारत   निवास  था।
मातृभूमि   अनुरक्ति, 
              प्रबल थी  इच्छा शक्ति,
होगा  ही  विमुक्त  देश, 
               अटल    विश्वास   था 
साहस  अदम्य  लिये,
               वैचारिक  क्रांति लिये, 
आया  महानायक जो,  
                वही  तो  सुभाष  था।

(2) 
नर हों  या नारी  अब,
               पीछे भीड़ भारी अब, 
फूटी  चिनगारी  युद्ध
              घोष  ऐसा  ला  गया।
धन  माँगें  धन  मिले,  
                खून माँगें  खून मिले, 
जैसे हो  आजादी मिले, 
                जोश ऐसा  छा  गया।
क्रांति की मशाल बने,
            गोरों का जो काल बने, 
आजाद हिन्द फौज में, 
              भरोस  ऐसा  आ गया।
शौर्य का  प्रणेता  रहा, 
              दिलों का विजेता रहा, 
वास्तविक  नेता  रहा,  
               बोस  ऐसा  भा  गया।

©रजनीश सोनी

टिप्पणियाँ

  1. अत्यंत उत्कृष्ट घनाक्षरी। वाकई नेताजी के व्यक्तित्व अद्भुत था।

    जवाब देंहटाएं
  2. दीप्ति सिंह "दीया"23 जनवरी 2025 को 3:25 pm बजे

    अत्यंत संवेदनशील एवं भावपूर्ण सॄजन 💐🙏

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आञ्जनेय छंद - हनुमान वंदना ©रश्मि शुक्ल 'किरण'

वो दौर ©सूर्यम मिश्र

अक्सर भूल जाते हैं ©दीप्ति सिंह

लेखनी स्थापना दिवस के उपलक्ष्य मेँ काव्य पाठ एवम मिलन समारोह ©अंजलि