लेखनी परिवार ©दीप्ति सिंह

 लेखन से है लेखनी, लेखन ही आधार ।

यहाँ सभी की भावना, लेती है आकार ।।


नाता निर्मल नेह का, बांधे मन की डोर ।

ये बंधन अनमोल है, इसका ओर न छोर ।।


अनुभव सबसे बाँटते, मिलकर रहते लोग ।

संबल सबका साथ है, सुंदर ये संयोग ।।


पावन गंगा ज्ञान की, बहती इसकी धार ।

जो डूबा वो पार है, जीवन का ये सार ।।


बनी रहे सदभावना, सबका हो सत्कार ।

ईश्वर से है प्रार्थना, पुष्पित हो परिवार ।।


                                    @ स्वरचित दीप्ति सिंह "दिया"


टिप्पणियाँ

  1. आप सभी का हृदयतल से धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

गीत- साँवरे न आए ©गुंजित जैन

छंद -सवैया ©संजीव शुक्ला

कोई हो अगर तो बताना ©तुषार पाठक

तोमर छंद - महाभारत युद्ध ©के एम कौस्तुभ