संदेश

गणपति वंदना ©दीप्ति सिंह

 गं गणपते गणनायका, वंदन सुमंगल दायका ।  हे विघ्नराज विनायका, वंदन सुजान सहायका । करते प्रथम आराधना,शिव-शक्ति सुत की साधना । निर्मल करे जो भावना,पावन करे जो कामना । छवि पावनी अति मोहका,आभा प्रकाशित कोटिका । गं गणपते गणनायका,वंदन सुमंगल दायका । सदबुद्धि विद्या ज्ञान दें,सन्मार्ग का वरदान दें । संतान पर प्रभु ध्यान दें, जग को नवीन विहान दें । हे मोह मद के मारका,अभिमान के संहारका । गं गणपते गणनायका,वंदन सुमंगल दायका । हे विघ्नहर्ता देवता, भव पार कीजै खेवका । निर्विघ्न संतन काज हो, सदभावपूर्ण समाज हो । वर दीजिये जग पालका,शुभ-लाभ के संचालका । गं गणपते गणनायका,वंदन सुमंगल दायका ।                   ©दीप्ति सिंह "दीया"

मोहिनी ©विपिन बहार

विधा-गजल वज़न-212,212,212,212  नैन मादक लिए घूमती हो कहाँ । हम यहीं हैं सनम ढूँढती हो कहाँ ।। ना समझ,ना बनो ,आज तो तुम जरा । चूमना था कहाँ चूमती हो कहाँ ।। रात-रानी बनी राज करने लगी । अब पता दूसरा पूछती हो कहाँ  ।। फोन को तोड़ने से हुआ क्या भला । टूटना था कहाँ टूटती हो कहाँ ।। आग ही आग हैं जान चारों तरफ । बेवजह आग में कूदती हो कहाँ ।।   चाहकर भी नही भूल पाया सनम । बन गई लत सनम छूटती हो कहाँ ।।  © विपिन"बहार"          

तुरपन ©अनिता सुधीर आख्या

  याद आती है  माँ की वो हिदायतें जो वो  दिया करतीं थीं... तुरपन इतनी महीन करना  दूसरी ओर दिखे न धागा.. मैं ग़लतियाँ करती रही सुई कई बार ऊँगलियों में चुभी   टीस उठती रहती  धागा दूसरी और दिखता ही रहा ... अब  जीवनके पन्ने पलट कर  देखते हैं  तो सोचते हैं  माँ तुम्हारी आकांक्षाओं पर  तब तुरपन सही थी या नहीं  पर अब माँ  इन महीन धागों से महीन तुरपन कर अधरों को सी रखा है ... माँ अब .. दूसरों को दिखता नहीं धागा  रिश्तों को बाँध रखा है  सहेजने में टीस उठती है  कुछ दिल में चुभती है  इस सहेजने  बाँधने में तुरपन टूटने का देर रहता है  पर माँ बहुत मेहनत से  आपने जो तुरपन सिखाई थी  उसका मान  रखना है न माँ ...     © अनिता सुधीर आख्या

उठ के देख सकारे ©आशीष हरीराम नेमा

 सूर्य उदित होने से पहले जगमग हों जब तारे । तब बरसाता सुधा सुधाकर दृश्य मनोरम प्यारे ।। ।।रे साधु उठ के देख सकारे ।। पहर ये चौथा शुभ फलदायी पुण्यकाल कहलाता , निशि वासर का सुखप्रद संगम अद्भुत छटा बनाता । मिटें निराशा के तम पाकर आशा के उजियारे ।। ।।रे साधु उठ के देख सकारे ।। साधक साधे सिध्दि उठकर जोगी जोग रमाये , छात्र करें अध्ययन व सज्जन प्रभु में चित्त लगाये । प्राणायम करें जन नित तो वैद्य ना झाँके द्वारे ।। ।।रे साधु उठ के देख सकारे ।‌। लगे मनोरम क्षितिज कि होवे जब ऊषा की वेला , पत्तों से मोती सम झरता तुहिन कणों का रेला । स्वयं प्रकृति अपनी छवि को तब अपने हाथ सँवारे ।‌। ।।रे साधु उठ के देख सकारे ।। शीतल पवन के झोंके से तरु तज देते सुमनों को, अरूणशिखा भी टेर जगाए बाकी सुप्त जनों को । कलरव करते पन्छी इत उत घूमें पंख पसारे ।। ।।रे साधु उठ के देख सकारे ।।        © आशीष हरीराम नेमा 

तुमसे कभी हारा नहीं हूँ मैं ©परमानन्द भट्ट

 हूँ अटल चट्टान सा  गारा नहीं हूँ मैं बारिशों तुमसे कभी हारा नहीं हूँ मैं टूट कर बिखरा हुआ हूँ कांच के जैसे  एक टुकड़ा ही बचा सारा नहीं हूँ मैं वक्त ने मुझको बदल के रख दिया साथी  ढूँढते हो आप वह यारा नहीं हूँ मैं मै धधकता सूर्य हूँ यह याद रख लेना टूटता है रोज वह तारा नहीं हूँ मैं  सिंधु ने खारा किया है स्वाद यह मेरा मै नदी का नीर हूँ खारा नहीं हूँ मैं  आदमी की वेदना को व्यक्त मै करता मात्र दृग से बह रहा धारा नहीं हूँ मैं  यह 'परम' तो रूह से संवाद को आता सिर्फ तेरी देह का मारा नहीं हूँ मैं            © परमानन्द भट्ट

मीत मेरे ©सरोज गुप्ता

 मीत मेरे मन के तुम प्रीत मेरे तुम हो हारे हुए जीवन में जीत मेरे तुम हो नेह बरसाऊँ सदा तुझपे इतराऊँ सदा तुम मेरी हो हमदम सबको बतलाऊँ सदा गीत तेरे गाऊँ संगीत मेरे तुम हो हारे हुए जीवन में जीत मेरे तुम हो मेरी नींदों में हो तुम तुम्हीं सपनों की रानी मेरी सासों में तुम्हीं तुम लहू की रवानी मेरे हर रिवाजों में रीत मेरे तुम हो हारे हुए जीवन में जीत मेरे तुम हो © सरोज गुप्ता

कुछ बातें ©शैव्या मिश्रा

चंद बातें कही नहीं जाती,  बिन कहे भी रही नहीं जाती l कोरे काग़ज़ पे ये लिखीं नज़्मे... हर किसी से पढ़ी नहीं जाती l रोज़अखबार देख लेते हैँ..  क्या करें तिश्नगी नहीं जाती l अब्र धरती पे बरस पड़ते हैँ..  दूरियाँ ज़ब सही नहीँ जाती l पंख टकरा के बिखर जाते हैँ  अब उड़ाने भरी नही जाती l                      ©शैव्या मिश्रा