संदेश

जून, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

गीत- घिरी बदरिया काली-काली ©ऋषभ दिव्येन्द्र

नमन माँ शारदे  नमन लेखनी             घिरी बदरिया काली-काली! तप्त धरा पर बनकर आँचल, भरें  चौकड़ी  ये दल-के-दल, मानो कोई हिरणी चलती, चाल चपल चंचल मतवाली!             घिरी बदरिया काली-काली! आतुर   भू  के   आलिङ्गन  को, व्याकुल दिखते महि चुम्बन को, झूम-झूम  के  रोर  मचाते, बरसावन  रसधार  निराली!             घिरी बदरिया काली-काली! श्याम   घनेरे  घन   बरसेंगे, सब के सब सुख से सरसेंगे, नीरस कण्ठ अधर मुरझाए, तृप्त कहो क्या होंगे आली?             घिरी बदरिया काली-काली! ©ऋषभ दिव्येन्द्र