कविता- गणतंत्र ©संजीव शुक्ला 'रिक्त'
नमन माँ शारदे नमन ,लेखनी जागो प्रिय ! स्वागत करो उठो , गणतंत्र द्वार पर आया है l बाहें पसार सत्कार करो, जननी ने तुम्हे बुलाया है l नव स्वर्ण रश्मियाँ वृक्ष शीर्ष, उद्यान पुहुप नव कुसमित हैँ l किसलय सर-सर, मृदु मंगल स्वर, वन लता कुंज अति हर्षित हैँ l खग कलरव मंगल गान मुदित, सरि कल-कल धारा का गायन l नव पल्लव तोरण द्वार सजे, अलि का अभिनंदन गुंजायन l लोहित मनहर पूरब लाली, रवि प्रथम किरण स्वागत पग-पग l निर्झर उच्छृंखल मुदित नाद, तृण शीर्ष तुहिन मुक्ता जगमग l उत्साहित पवन झकोर मंद, द्रुम दल के संग किलोल करें l सुरभित झोंके चंदन वन के, कण-कण में मृदुल सुगंध भरें l खेतोँ की हरियाली, कछार, बस्ती, गलियाँ, चौबारों में l उत्साह पर्व का छाया है, घर-घर, आँगन, ओसारों में l सज तीन रंग की चूनर में, जननी हर्षित मुस्काती है l हिमगिरि किरीट मस्तक सोहे, पग सिंधु लहर धो जाती है l यह पुण्य,देव दुर्लभ धरती, आओ हम सौ-सौ नमन करें l इस पावन चंदन माटी को, गर्वित हों सादर शीश धरें l बलिदान प्राण कर जिन वीरों, ...