संदेश

लेखनी कुटुंब ©आकांक्षा तिवारी

 दोहा ग़ज़ल गीत सब विधाओं का रूप अनंत हैं   लेखनी के पटल पर छाया आज वसंत हैं   आप सब के गुणों की सारा जग चर्चा करे   साहित्य के अनमोल रत्न भाव यह वर्षा करे     बुद्धि वैभव आत्मबल में वृद्धि प्रभु कीजिये   साहित्य समर्पण हिंदी सेवा को नई दिशा दीजिये  काव्य सृजन की वीथिका से हम सब कवि बने   साहित्य सेवा में लीन हो रोज इक नया रवि बने   आप सब की लेखनी सर्वत्र हैं अविराम हैं   हे !लेखनी के गुणीजनों कोटि कोटि प्रणाम हैं                                                        @ Akansha tiwari

दोस्ती ©गोपाल

  खट्टा मीठा रस भरा रिश्ता।। बन्धनों से परे सबसे करीबी है चाँद सितारों सा काल्पनिक महबूब नही वो हकीकत जिंदगी की हसी है जिंदगी के हर पड़ावों का साथी है चाहे खुशी हो या गम फिर भी ,संभाले रखता हैं इसमें कभी प्यार जताया नी जाता है मस्ती में खूब हँसाया जाता है  नफरतों की जगह नही होती मिलकर लड़ने, की एक आदत होती कभी जो अलग भी हो जाये दिल उनके बिना नही लगता न वो हिस्सेदार है न वो रिश्तेदार भले दुश्मन हजार है , वो सबके हथियार है वो तो दिल के कर्जदार है वो खुदा तो नही पर हर मुश्किल का हल  हैं कुछ उलझनों से वो भूल जाते है दोस्त को  पर यकीन माने वो दोस्ती कभी नही भुलाते बिछुड़ भी जाते हमेशा के लिए फिर भी हर रोज याद वो आ जाते उसका होना ही , हौसला है जिंदगी का उसका मिलना भी , किस्मतों का फैसला है वो प्यारा दोस्त हैं जो जग से न्यारा है                                                                         ...

सलीका © रजनी सिंह

 अपनों की आग से छुपता मेरा सलीका । ड़रा सहमा सा है लुकता मेरा सलीका ।। तसलसुल ख़िज़ां से उबता मेरा सलीका.... एतिमाद आंच पे पकता मेरा सलीका । पयम्बरों के सहीफे जैसा मेरा सलीका.... जहानें ज़ीस्त में फैलता मेरा सलीका । हनूज नहीं रो पाया जो मेरा सलीका.... रोज-ओ-शब है तड़पता मेरा सलीका । तुर्बत में अब ये जाएगा मेरा सलीका.... गर्दिश के कूचे निकलता मेरा सलीका ।। तस्कीन से बंधे कब तक मेरा सलीका.... खालीक से सवाल पूछता मेरा सलीका ।।                                                  @ रजनी सिंह 

माँ ©माधुरी मिश्रा

चित्र
माँ तेरी ममता की छाँव तले सूरज की तपिश कुछ भी तो नहीं। तू निर्मल, शीतल, पावन इतनी  गंगा, अमृत तो कुछ भी नहीं। तेरे प्यार भरे स्पर्श से ही भूल जाती हूँ मैं गम सभी। तेरी हौसलों भरी बातें देती है  मुझे धैर्य, हिम्मत और सहनशक्ति। तेरी आँखों में गहराई इतनी सागर की जैसे थाह नहीं। तेरा हृदय विशाल है व्योम-सा तू अंधियारे की प्रथम किरण। ये नभ, ये जग, सारी सृष्टि  निर्जीव अथवा हो जीवधारी, इस प्रकृति की विशिष्ट कृतियाँ  तेरी तुलना में कुछ भी तो नहीं। तुझमें ही सभी का वास है तेरे संग हर लम्हा खास है। 'माँ' तू मेरे जीने की वजह बिन तेरे 'मधु' कुछ भी तो नहीं।                               @श्रीमती माधुरी मिश्रा                                      

मेरा परिचय ©सरोज गुप्ता

मन की वेदना मुझसे पूछे मेरा परिचय, मैं क्या हूँ  ॽ इधर-उधर में बिखर गई मैं कटी पतंग का जीवन हूँ ।। टूटे विश्वासों का परिचय टूटी आशा का क्रंदन हूँ । अपनी भूलों की परछाई पीड़ा का अभिनन्दन हूँ ।। काले  रंगों  की  रंगोली इक विरहन की सिसकी हूँ   । टूटे फूटे  स्वप्न के  टुकड़े यादों की इक हिचकी हूँ ।। बीते जगत की याद समेटे उसके प्रेम का दर्पण हूँ । सूखे अश्रु की सरिता मैं अब बसंत की पतझड़ हूँ ।। वाणी का संगीत मधुर मैं इक प्रणयी की कविता हूँ । और नहीं कुछ मेरा परिचय अपने प्रीतम की प्रतिमा हूँ ।।                                   @सरोज गुप्ता

मैं और मेरी कलम ©रेखा खन्ना

 जब मैं लिखती हूं तो मेरे अंदर का शोर काग़ज़ पर आता है उतर मन के दरवाजे से चुपके से कलम मेरे जज़्बात चुरा लेती हैं। मेरे अंदर की तन्हाइयां, बैचेनीयां, गिले-शिकवे और तड़प सब काग़ज़ के कानों में कह देती हैं गुपचुप मैं जो नहीं कह पाती हूं उसे लिखते हुए आंसू बना‌ लफ्जों का रूप देती हैं। मेरे अंदर का शोर अक्सर पूछता है मुझसे  क्यूं इक्कठा कर रखा मुझे अपने अंदर तुम ने ऐसा क्या है जो खाए जा रहा अंदर ही अंदर तुम्हें। कभी-कभी मेरी कलम भी हो जाती हैं बेबस जब दिल का कोई बंद दरवाजा नहीं खुलता उससे। कुछ एहसास दिल के तहखाने में भी हैं बंद शायद इक उम्र से भाग रही हूं उनसे पीछा छुड़ाने को। कलम हर बार इसी कोशिश में लगी रहती हैं इक बार कह दूं तो शायद मिले कुछ सुकून। डरती हूं शायद आंखों के सामने सब कुछ ना जी उठे इक बार फिर भागती हूं और छिप जाती हूं अपनी कलम से बच कर पर कलम भी मेरे सब अड्डे जानती है छुपने के। मैं बेशर्म हूं या कलम हैं ठीठ यह भी सोचती हूं अक्सर  मैं बताना नहीं चाहती और वो मेरा पीछा ही नहीं छोडती। फिर भी ना जाने कैसे पढ़ लेती हैं हाव-भाव और उतार-चढ़ाव मेर चेहरे के लिख जाती हैं...

अब चलना होगा ©नवल किशोर सिंह

अब चलना होगा  नयन उनींदे खोल, बीन लो सपन सुहाने । करके पग गतिमान, पास मंज़िल है लाने॥ लाखों पथ में शूल, तुम्हें वो दलना होगा । लेकर मन में ठान, पथिक अब चलना होगा॥   आहत होंगे पाँव, बींधकर रक्त बहेगा । जाने कितने भाव, रोक ये कदम कहेगा ॥ घातों को सब जान, छली को छलना होगा । लेकर मन में ठान, पथिक अब चलना होगा॥   रजनी के उस पार, आग का धधके गोला। जग में हो उजियार, दाँव पर उसका चोला ॥ सूरज बन चुपचाप, तुम्हें अब जलना होगा । लेकर मन में ठान, पथिक अब चलना होगा॥ निर्झर से जल पात, दूर है बहकर जाता । गिरने की ही सीख, पास सागर के लाता ॥ जड़ जंगम हिमखंड, उसे अब गलना होगा ।   लेकर मन में ठान, पथिक अब चलना होगा॥                                             --©नवल किशोर सिंह