कविता- ये बारिशें क्यों मुझे ढूंँढती हैं? ©रेखा खन्ना
नमन माँ शारदे नमन लेखनी वो खिड़की के बाहर से भीतर झांँकती हुई बारिश की बूँदों का मुझे देख कर मचलना और वो मेरे भीतर की बारिश का ना थमना, कितना मुश्किल है मौसमी बारिशों में बे-मौसमी बारिश को बरसने से रोकना। ज्यादा गीली कौन सी बूंदें हैं, बताओ? वो जो बादलों से बरसी हैं या फिर वो जो आँखों से छलकी हैं? एक सिर्फ़ जो पानी हैं या वो जो सिर्फ़ जज़्बातों को बयां करती हैं? ये बारिशें क्यों मुझे ढूंँढती हैं? क्या है मेरा और इनका रिश्ता? कुछ बादल कुछ घटा थोडा़ पानी बहुत सारे एहसास एक रिश्ता बहुत गहरा लगाव कुछ बूँदें पर तरसता मन का आसमां एक ख्वाहिश भीगूँ मैं भी बारिश की बूंँदें मुझे भिगोएं कैसे? भीतरी बारिशों से सराबोर मैं कोई कोना सूखा नहीं जिसे भीतरी बारिश ने छुआ नहीं मौसमी बारिश कहे कभी तो मुझे थोड़ा सा सूखा मिल मैं कहूँ, कभी तो भिगो मुझे जब मैँ भीतरी बारिशों से नाराज़ रहूँ कुछ सूखी कुछ गीली सी मैं मौसमी बारिशों में भीगने को तरसती रही खिड़की के बाहर से ...