होली विषयक प्रतियोगिता के परिणाम
लेखनी परिवार द्वारा होली पर्व पर होली विषयक प्रतियोगिता का आयोजन सफल रहा। सभी रचनाकारों की एक से एक उत्कृष्ट रचनाएं आईं, जिनमें से विजेता चुन पाना निश्चित रूप से निर्णायकों के लिए बहुत कठिन था, किन्तु नियमानुसार विजेता चुनना अनिवार्य था। अतः प्रतियोगिता के परिणाम एवं विजेता रचनाएं कुछ इस प्रकार हैं:-
प्रथम स्थान
1. आ० सुविधा पंडित जी
होली-गीत
मत्तगयन्द सवैया आधारित
फागुन की पिचकारि चली सत रंग रँगी धरती इठलाई।
पीत कुसुंब ललाम व श्वेत खिले नव पुष्प मही गदराई।।
फागुन से मिल झूम उठी पुरवा शुचि शीतल मंद सुहाती।
किंशुक की छवि लाल-ललाम कि यौवन-कानन को दहकाती।।
गाल गुलाल लिखे नव छन्द न साजन से सजनी बच पाई।
फागुन की...।।
होठ गुलाब व गाल गुलाब कि गात गुलाब-लदी जिमि डाली।
रंग गुलाल दिखे किस भाँति प्रिया-मुख शोभित है निज लाली।।
वो मुख से लट को तन से पट को झटका-झटका इतराई।
फागुन....।।
बेध रहा मन को अब मन्मथ रंग पगे जब बाण चलाए।
नैनन के घट से मदिरा छलका-छलका कर प्रीति बढ़ाए।।
पुष्प-सुवासित नीर झरा कर प्रीतम ने सजनी महकाई।
फागुन.....।।
रंग-गुलाल उड़े प्रिय नाच रहे तक-ता-धिन देकर ताली।
झूम रहे हँसते-हँसते कुछ बोल रहे जिमि भंग लगा ली।।
प्रीतम-पाश कसी सजनी मसली अति कोमल गौर कलाई।
फागुन...।।
साजन-वर्ण लगा सजनी-तन श्यामल किंचित नील बनी है।
साजन गौर हुए तबसे सजनी-तन की मन प्रीति सनी है।।
पुष्प उड़े व सुगंध भरे सँग फूल रहे महुआ अमराई।
फागुन.....।।
प्रीतम-प्राण बड़े रसिया निज चक्षु बना कर ही पिचकारी।
नेह-फुहार रहे बरसा सजनी अब भीग गई मय-सारी।।
रास रचे परिहास करे इस फाग लगी सजनी भरमाई।
फागुन...।।
वस्त्र उड़े अरु केश उड़े मन भी उड़ता लगते ठुमके हैं।
कांति नवीन लिये प्रिय और प्रिया मुख हर्षित-से चमके हैं।
देख निसर्ग हुई मन ही मन मोहित ज्यों वनिता मदमाई।
फागुन...।।
©सुविधा पण्डित
1. आ० परमानंद भट्ट "परम" जी
हम अपने मन के कमरे की साँकल खोलें इससे पहले
मनमौजी मतवाला मौसम रंग उड़ाकर लौट गया
कुण्ठाओं के सर्पिल बंधन ,अवसादों के अगणित घेरे
अहंकार की इस कारा में, कैद रहे हम शाम सवेरे
हम उससे अपने मन की कुछ बातें बोले उससे पहले
वासंती सपनों का सहचर,गीत सुनाकर लौट गया
इच्छाओं की अमरबेल यह संग उम्र के बढ़ती जाती
रोज़-रोज़ लिखकर फाड़ी है हमने हर चाहत की पाती
रंगों की बारिश में हम भी ,तन-मन धो लें उससे पहले
हृदय-देश में मीत हज़ारों चंग बजाकर लौट गया
मन की गाँठें खोले बिन हम कैसे फागुन से मिल पाते
वासंती यह गीत सजीले,बिन ख़ुशबू किस तौर सुनाते
सतरंगी इच्छा की कलियाँ घुँघट खोलें उससे पहले
फगुनाया वह शोख़ परिंदा ,शाख सजाकर लौट गया
©परमानन्द भट्ट
द्वितीय स्थान
2. आ० मधु झुनझुनवाला "अमृता" जी
नमन माँ शारदे
सरसी छंद आधारित जोगीरा
(१६-११)
रंग फाग का बिखरा नभ में, क्षितिज हुआ रतनार।
कानन-कानन महुआ महके, मस्ती भरे अपार ।।
जोगीरा सारा रारा रा ।
जोगीरा सारा रारा रा ।।
घाट-घाट में घूमे ग्वालिन, ढूँढत नंदकिशोर।
रंग चुराये माधव ने सब, भीगे नैनन कोर ।।
जोगीरा सारा रारा रा।
जोगीरा सारा रारा रा।।
गोकुल की गलियों में कान्हा, नाच रहा मन मोर।
आकर रंग लगा जा मोहन, पायल करती शोर।।
जोगीरा सारा रारा रा।
जोगीरा सारा रारा रा।।
प्रेम रंग में भर पिचकारी, कान्हा डाले अंग ।
श्याम पिया के तेवर देखे, राधा रह गई दंग ।।
जोगीरा सारा रा रा रा।
जोगीरा सारा रा रा रा।।
मन मधुबन हो रहा कन्हाई, लोहित देख पलाश।
झरे नयन से चंचल मणिका, बाँधे साजन पाश ।।
जोगी सारा रा रा रा।
जोगी सारा रा रा रा।।
©मधु झुनझुनवाला ''अमृता''
2. आ० ऋषभ दिव्येन्द्र जी
नमन माँ शारदे🙏🏻
नमन लेखनी
*होली गीत*
गाँठ बाँध रंगों की झोली।
सुभग शगुन ले आई होली।।
मादकता ले महुआ महका।
मलयानिल से मौसम बहका।।
नवल लता लोचन ललचाती।
ललित लालिमा हृदय लुभाती।
ऋतु ने मधुरिम मिसरी घोली।
सुभग शगुन ले आई होली।।
धूम मचाते हैं हुरियारे।
द्वार-द्वार गूँजे जयकारे।।
ढोलक झाँझ-मँजीरा बाजे।
फगुआ की सुर लहरी साजे।।
छाती चहुँदिशि हँसी-ठिठोली।
सुभग शगुन ले आई होली।।
भीगा फागुन भीगा तन-मन।
चाल चपल चलती है चितवन।।
संग साँवरी का मिल जाए।
सतरंगी-सा हृद खिल जाए।।
छवि नयनों में बसती भोली।
सुभग शगुन ले आई होली।।
©ऋषभ दिव्येन्द्र
तृतीय स्थान
3. आ० अनन्या तिवारी जी
*नमन माँ शारदे🙏🏻*
*नमन मंच 🙏🏻*
(सरसी छंदाधरित गीत)
मनमोहक मनभावन लगता, रंगमयी त्योहार।
हिय उल्लासित हो जाता है, सुखमय-सा संसार।।
लाल गुलाबी पीला नीला, डालें सब पर रंग।
मुखड़े पर पोते लाली को, आज भिंगा दें अंग।।
भाँग मिलाकर ठंडाई में, पीते सारे यार।
मनमोहक मनभावन लगता, रंगमयी त्योहार।।
नाच गान सँग मस्ती होती, उड़ता खूब गुलाल।
डीजे बजता अपनी धुन में, करते सभी धमाल।।
मतवाले मदमय हों झूमें, उनपर चढ़ा खुमार।
मनमोहक मनभावन लगता, रंगमयी त्योहार।।
प्यारा ये रंगो का मेला, आओ झूमे मीत।
राग ताल मिलकर छेड़े हम, गाएँ फागुन गीत।।
पर्व सनातन रंगोत्सव का, है सबको स्वीकार।
मनमोहक मनभावन लगता, रंगमयी त्योहार।।
©अनन्या तिवारी
3. आ० रश्मि शुक्ल "किरण" जी
*विषय-होली*
*आधार_छंद- "मंगलमाया मात्रिक छन्द*
22 मात्रा,11-11 पर यति,यति से पूर्व "गाल/21" और यति के बाद"लगा/12" अनिवार्य।
छोड़ सभी तकरार,मनाना होली है।
रंगों का त्यौहार, मनाना होली है।।
सुंदर रूप अनूप,नयन काले काले।
राधा कान्हा संग, मगन सारे ग्वाले।।
बरस रहा है नेह, सजल हैं नर नारी।
बोलें जय जयकार,मधुर क्षण बलिहारी।।
प्रीत भरी मनुहार, मनाना होली है ।
रंगों का त्यौहार, मनाना होली है।।
रंग लगाए लाल,लिए है पिचकारी।
नीले पीले गाल,भली सूरत प्यारी।।
चटकीले से रंग,सभी के मन भाए।
होली खेलन आज,सजन ससुरे आए।।
उमड़ रहा है प्यार, मनाना होली है।
रंगों की बौछार, मनाना होली है।।
प्रकृति करे शृंगार,बदलती है काया।
खिला खिला हर अंग,सभी के मन भाया।।
रंग गुलाल अबीर,उड़ाते सब आएं।
ढोल मंँजीरा साथ,सभी फगुआ गाएं।।
खुशियों की बौछार, मनाना होली है।
रंगों का त्यौहार, मनाना होली है।।
मिष्ठ सभी पकवान,बनाए बैठी मांँ।
द्वारे पर ही आस,लगाए बैठी मांँ।।
मीठी मीठी हूक,जिया में आई है।
यादों की सौगात,रंँगीली लाई है।।
लाल रहो तैयार, मनाना होली है।
रंगों का त्यौहार, मनाना होली है।।
©रश्मि शुक्ल 'किरण'
सभी विजेताओं को बधाई एवं अन्य सभी रचनाकारों को भविष्य के लिए अनंत शुभकामनाएं। लेखनी परिवार आगे भी ऐसी प्रतियोगिताएँ लाता रहेगा।✨✨🎉🎉
सुव्यवस्थित आयोजन की बधाई ,समस्त विजेता प्रतिभागियों को बधाई l 💐
जवाब देंहटाएंसमस्त विजेता प्रतिभागियों को अनंत मंगलकामनाएं 🎉🎊🙏
जवाब देंहटाएंसभी विजेताओं को अनंत शुभकामनाएं💐
जवाब देंहटाएं