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ग़ज़ल ©सूर्यांश सिंह 'कालख'

 नमन माँ शारदे नमन लेखनी रमल मुसम्मन महज़ूफ़ फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन 2122 2122 2122 212 चल पड़ा दरिया तो पीछे–पीछे बहकर आ गए, खुद को जो पर्वत समझते थे ज़मीं पर आ गए। मिल गया मुझको तो गाँधी सी वफादारी का फल, मेरे आँगन में हर इक मज़हब के पत्थर आ गए। ये मिजाज़–ए–मंज़िलत बेकार साबित हो गई, क्यों जहां से हम चले थे फिर वहीं पर आ गए? क्या बताएं रास्ता कैसा था वो मंज़िल थी क्या? बस ये समझो शुक्र है हम लौट कर घर आ गए। देख ‘कालख’ दोस्ती–यारी है ना यूं मसखरी, वो उठा तो हम भी उस महफ़िल से बाहर आ गए। ©सूर्यांश सिंह ‘कालख’

कहानी- तस्वीर ©गुंजित जैन

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी "एक किताब ने हिलाकर रख दिया पूरा शहर।" सभी न्यूज़ चैनल इसी खबर से भरे पड़े थे। और हों भी क्यों न? किताब ही ऐसी थी। "बेस्ट सेलर तो यही होगी" आम आवाम में बस यही बातें चल रहीं थी। दीन दयाल जी, उस किताब के लेखक, रातों रात प्रसिद्ध हो गए। दीन दयाल जी हमेशा से एक उम्दा लेखक रहे हैं मगर उनकी प्रतिभा लोगों तक पहुँच नहीं पाई। जीवन के पैंसठ सावन बीत जाने के बाद उन्हें ये प्रसिद्धि मिली जिसकी उन्हें हमेशा से आशा रही थी। किन्तु कहा जाता है न, असल हुनर दबा दिया जाता है, कुछ वैसा ही हाल यहाँ था। लेकिन इतनी प्रसिद्धि पाने के बाद भी वे उदास थे। जाने क्या बात रही होगी, किसी को मालूम नहीं था। सिर्फ़ उस बूढ़े लेखक का दिल ही जानता था। "रातों रात प्रसिद्ध हुए हैं, ज़रूरी तो नहीं अच्छे लेखक हों। इनका इंटरव्यू लेने की जगह और कुछ बेहतर शूट न किया जाए?" रिपोर्टर वाणी जी अपने चैनल के दफ़्तर में अपने सीनियर को बार-बार दीन दयाल जी का इंटरव्यू लेने से मना कर रही थी। "नहीं वाणी, इस बूढ़े ने शहर हिला दिया है। बढ़िया, गरम गरम खबर है। दुनिया को बेहतर खबरों से ज्यादा...