गीत- एकल ©लवी द्विवेदी
प्रेम का संगीत गाकर, नेह की वीणा बजाकर। प्राण में बसकर हमारे, क्या पता था, प्राण प्यारा प्राण लेगा।। मान ले यदि दोष मेरा, तज चले, करके बसेरा। किंतु एकल उस निलय को, देख बीहड़ क्यों बुहारा ? गेह स्मृतियां पुरानी, थी अधूरी, पर कहानी। स्मरण करके कभी क्या, अन्न ले करके पुकारा ? गुनगुनाता चहचहाता, उड़ रहा था खग यहीं पर। दो दिवस बीते, नहीं वो.. दिख रहा क्यों, है कहीं, पर.... है कहाँ? यदि कर सके उपकार यह ना, खग वहाँ कैसे उड़ेगा ? प्राण में बसकर हमारे, क्या पता था, प्राण प्यारा प्राण लेगा।। नैन यदि शृंगार करके, रो पड़ें भी व्योम भरके। पीर जिनकी आपदा बन, आँधियाँ भी सींच सकती। मर्मभेदी यातनाएं, शांत हिय की वेदनाएं। यदि हुई विकराल हिय में, गर्जना को भींच सकती। दामिनी हिय की भड़क यदि, जाए तो घबरा उठेंगे। दंभ रूपी वृक्ष जो ना.. झुक सकें वो भी झुकेंगे। किंतु मन में मन दबाकर, मर रहा जो, चैन से क्या मर सकेगा ? प्राण में बसकर हमारे, क्या पता था, प्राण प्यारा प्राण लेगा। वक्ष ने विश्वास बोया, और फिर क्या क्या न खोया। प्रेम में परिहास बनकर, रह गया हर एक...