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ग़ज़ल ©रजनीश सोनी

 वन्दे वागेश्वरी  नमन लेखनी  ग़ज़ल   बे-वजह के उसूल क्यों कुबूल हम कर लें।  फूल सी जिन्दगी कैसे बबूल हम कर लें।।  जो बुलाते हैं  गजल गीत शायरी के लिये,  चाहते हैं  खरा  पैसा  वसूल  हम  कर लें।  लोग इजहार करेंगे  मगर  है  ना-मुमकिन,  दोस्ती जाने बिना क्यों फिजूल हम कर लें।  नेक  नीयत  रहे   तो  लोग  तबज्जो  देगे,  खुदा की राह पे खुद को रसूल हम कर लें। देख  पाकीज़गी  भी  चीज  कोई होती है,  गुलबदन है  इसे कैसे के  धूल हम कर लें।  "नेह"  नैनो में  किसी के  समा गये हैं जब,  ये मुनासिब नही कि और भूल हम कर लें। ©रजनीश सोनी "नेह"

ग़ज़ल ©धीरज दवे

 नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी 2122 2122 212 आख़िरी उम्मीद तेरे नाम पर , और फिर अपना भरोसा राम पर। इक तुम्हारी ओढ़णी के वास्ते , सब सितारे झुक गए हैं बाम पर। नींद भी है याद भी है जोश भी , और कितना बोझ डालूं शाम पर। एक इंसाँ के सिवा कुछ भी नहीं , बिक रहा है कौड़ियों के दाम पर। इश्क का इल्ज़ाम गर है आपसे, नाज़ क्यूँ ना हो हमें इल्ज़ाम पर। दिख रही हैं आप खाली ग्लास में , लग गया है जाम अपने काम पर । ©धीरज दवे

गीत- ज़िन्दगी ©दीप्ति सिंह "दीया"

 नमन, माँ शारदे  नमन, लेखनी  छुपाया है मैंने...बहुत अपने गम को  मगर जिंदगी तेरा नाम आ रहा है  लबों की हँसी से नज़र की नमी को  छुपाना हमारे भी काम आ रहा है    मैं अपने सफ़र में...अकेला चला था  यूँ ही रास्ते में .... मुझे गम मिला था  मेरा गम है साया.... मेरी जिंदगी का मेरे साथ ग़म वो तमाम आ रहा है   बनाया है मैंने...गमों को ही साथी  मेरी जिंदगी में... हैं बस दर्द बाकी हमारा सफर तो...यूँ ही चल रहा है  जिकर गम का तो सुबहो शाम आ रहा है निराशा के बादल... यूँ हमको हैं घेरे  मेरे रास्तों पर  ....... घने  हैं  अंधेरे कभी तो कहीं पे... सहर भी खिलेगी  यही हौसला मेरे काम आ रहा है   ©दीप्ति सिंह 'दीया'

मरहटा छंद- गुरु ©ऋषभ दिव्येन्द्र

गुरु पूर्णिमा की असंख्य शुभकामनाएं💐 नमन माँ शारदे नमन लेखनी छंद- मरहटा छंद कुल मात्रा- 29,  10,8,11 पर यति। पहली एवं दूसरी यति समतुकांत दो-दो या चारों चरण समतुकांत। चरणान्त- गुरु लघु अनिवार्य यह सत्य सनातन, बात पुरातन, नहीं जगत गुरु ठौर। चेतन के स्वामी, बहु पथ गामी, बदलें जीवन तौर।। विद्यावानों के,  धी मानों के,  वेद  व्यास  सिरमौर। इनके सम ज्ञानी, बहु विद्वानी, कहाँ धरा पर और।। ©ऋषभ दिव्येन्द्र

गीत- नीड ©गुंजित जैन

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी विधा- गीत आधार छंद- मुखड़ा, समांत सरसी छंद एवं अंतरा सार छंद सरसी छंद (विषम पद मात्रिक छंद) विधान- मात्रा-२७,  यति - १६,११ चरणान्त - SI  विशेष – सरसी = चौपाई(१६) + दोहा का सम चरण(११) सार छंद (विषम पद मात्रिक छंद) विधान- मात्रा-२८,  यति - १६,१२ चरणान्त - SS   भोजन हित भटका जीवन भर, किन्तु मिला संताप। नीड छोड़कर उड़ता नभचर, करता रहे विलाप। छोड़ गया अपने परिजन को, नभ में पर फैलाने, क्षण-क्षण रहकर दिखते मन को, मुख जाने-पहचाने, स्मृतियों का विस्तृत अम्बर, नहिं पाता है नाप। नीड छोड़कर उड़ता नभचर, करता रहे विलाप। नन्हे शिशु के मुख में दाने, डाल नहीं पाया है, चिंतातुर मजबूर पिता ने, हिय को समझाया है, कैसे पहुँचे इतनी ऊपर, नन्ही मृदु पद-चाप। नीड छोड़कर उड़ता नभचर, करता रहे विलाप। व्याकुलता लेकर निज मन में, खग चिंतित रहता है, पीड़ा लिए अनंत गगन में, सूर्य ताप सहता है, झरते झर-झर अश्रु निरंतर, रवि से बनते भाप। नीड छोड़कर उड़ता नभचर, करता रहे विलाप। ©गुंजित जैन

गीत- मधुमास ©संजीव शुक्ला 'रिक्त'

  नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी सरसी छंद( विषम पद मात्रिक छंद) विधान-  मात्रा-२७,  यति - १६,११ चरणान्त - SI  विशेष – सरसी = चौपाई(१६) + दोहा का सम चरण(११) सार छंद (विषम पद मात्रिक छंद) विधान- मात्रा-२८,  यति - १६,१२ चरणान्त - SS (मुखड़ा, समांत सरसी छंद एवं अंतरा सार छंद आधारित)  गीत-मधुमास तिल-तिल सूरज संग सुलगता, सुधियों क़ा संत्रास l पूरी रात बरसता टप-टप,...... नयनों से मधुमास l अंतर पोखर उफ़नाता है,.......तप्त पीर का पानी, मन की सोन मछरियाँ व्याकुल,पीड़ा से अनजानी l दग्ध हृदय की लपटें देती,पर्वत का आभास l गंगा जमुना धारा बहती,...आँखों क़े कोरों से l स्वप्न चिता की राख टटोलें,ऊँगली क़े पोरों से l अस्थि कलश नातों क़े,हाथों में छलता विश्वास l दूर गगन उड़ गए पखेरू, कल कल कलरव करते l चंदन बिरवा ठूँठ प्राण चढ़,.....सौ-सौ बार उतरते l सोन चिरैया छिपी कहीं, जाकर बादल क़े पास l मुरझाई क्यारी डाली-डाली में पतझड़ आया, विकल भृंग गुन-गुन क्रंदन में,करुण विलाप समाया l  उजड़ी पुष्प वाटिका खोई मोहक सुमन सुवास l विकल प्राण सुधियों के सागर में डूबें उतराऐं, भूले भटके पंछी पिंजड़े,में...

गद्य- प्रियतम ©रानी श्री

नमन, माँ शारदे नमन लेखनी  प्रियतम, हम तो इस संसार में नहीं हैं किंतु कण-कण में बसा हमारा अमरप्रेम आज भी यहां गुंजायमान है। स्मरण में है क्या, जिस क्षण हमारा प्रथम मिलन हुआ था व जिस क्षण आप पर दृष्टि पड़ते ही मेरी सृष्टि में प्रेम तरंग की वृष्टि हुई थी। कितना असीम अनुभवपूर्ण क्षण था, जब आपके पग मेरी ओर बढ़े थे। मेरे आंतरिक व बाह्य तंत्र व तंत्रिकाएं तो शिथिल पड़ गये। किंचित ही संभव हो जब एक मनुष्य मेरे इतने निकट आया और मेरा हृदय स्पंदन तीव्रतम सीमा पर जा पहुंचा, इश्वर जाने मैं क्यों थर्रा उठी और स्वेद पूर्ण हो गयी। दर्शित नहीं हुआ होगा किंतु मेरी दशा केवल मुझे ज्ञात है। मस्तिष्क शून्य हो कर भी कोलाहल से पूर्ण था। प्रथम दृष्टि का अनुराग संभवतः इसी प्रकार को होता होगा। नवयौवन की सरिता के तट पर खड़े आप, अपने श्याम व मनमोहक वर्ण, मखमल कपोल, तिस पर चंचल चतुर तीक्ष्ण नयनों से जब मेरी ओर सम्मुख हुए, अंबर की समस्त तड़ितों ने हृदय पर त्वरित कड़े आघात कर दिए। निस्संदेह प्रतीत नहीं हुआ किंतु जो व्यतीत हुआ वही तो जीवन गीत हुआ। आपके पंकज समान ओष्ठ से बाहर निकली माधुर्य से लथपथ वो कर्णप्रिय लावण्...

कौन? ©सौम्या शर्मा

 नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी मुमकिन ही नहीं समझना जिनका! बात दिल की उनको बताता है कौन? जरा सा डगमगाकर देखिए जनाब! संभालने यहां आपको आता है कौन? छूट जाते हैं सब यहां बीच सफर में! हश्र के दिन तक साथ निभाता है कौन? इस दौर में रूठना तो सोच लेना फिर से! रुठे हुओं को आजकल मनाता है कौन? खैरियत कह दीजिए सब यकीं करेंगे! रूह की तहों तक यहां जाता है कौन? रौशनी ने खुद ही उम्मीद छोड़ दी जहां! उस देहरी पर दिए जलाता है कौन? लगता है दूसरी ही दुनिया के हो तुम! दर्द पर यूं भी मरहम लगाता है कौन? ©सौम्या शर्मा

तुम्हारा साथ ना छूटे ©धीरज दवे

 नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी बाद बरसों के लिखा इक खत तुम्हारा मिल गया है जिसमें सबकुछ है दुआ है बद्दुआ है अलविदा है रुक गया हूं एक पंक्ति पे हृदय में भरभराकर पूछती हो तुम जहां कि क्या करोगे दूर जाकर तो सुनो ये बात मन की, बात ना फूटे  पुण्य संचित कर रहा हूं मैं कि अब अगले जनम में हाथ ना छूटे तुम्हारा साथ ना छूटे  डूबता हूं मैं मगर अब तार देता हूं जगत को गर सही को ओढ़ भी लूं साथ रखता हूं गलत को भेद कुछ करता नहीं हूं वेदना में प्रेरणा में अब किसी को कुछ भी मैं कहता नहीं हूं व्यंजना में धर्म पोषित कर रहा हूं मैं कि अब अगले जनम में  हाथ ना छूटे तुम्हारा साथ ना छूटे मैं कि पीड़ा को बना कर गीत गाता जा रहा हूं झेल कर पत्थर जगत से भी बहुत इतरा रहा हूं शत्रुओं से बैर कैसा प्रीत कैसी मित्रता में दुख ही सुख है सुख ही दुख है गुनगुनाता जा रहा हूं दैव योजित कर रहा हूं मैं कि अब अगले जनम में  हाथ ना छूटे तुम्हारा साथ ना छूटे मैं गगन से टूट कर भी आ गिरा हूं फिर गगन में बन गया हूं ईश अपना आ गया अपनी शरण में फूंक कर के कामनाएं मार कर हर इक पिपासा मैं चमकते नेत्र ले कर चल रहा हूं अधम...