ग़ज़ल ©संजीव शुक्ला

 कल चाँद काफ़ी दूर था l

बस चाँदनी का नूर था l


था अर्श बेहद शाद कल ...

पहलू में हुस्न-ए-हूर था l


बस बेखुदी बेताबियाँ....

आलम नशे में चूर था l


मदहोशियाँ बहकी फ़िज़ा...

हरसू अजीब....सुरूर था l


कलियाँ खिलीं महका समा ...

रोशन गुहर....... मगरूर था l


वादी में बिखरी चाँदनी....

दिलकश समा भरपूर था l


सरगोशियाँ करती हवा...

हर दर्द ग़म..काफूर था l

©संजीव शुक्ला रिक्त

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