आदमी ©विपिन बहार

 गजल वज्न-(2122,2122,2122,212)


कर्म कैसे कर दिए हैं आँकता हैं आदमी ।

आज घर मे छुप-छुपाकर झाँकता हैं आदमी ।।


रोजगारी का दिवाला अब निकलता ही गया ।

मोर बनकर देहरी पर नाचता हैं आदमी ।।


पाप सारे अब यही पर भर विदा होंना सुनों ।

खुद हकीकत से अभी भी भागता हैं आदमी ।।


दौर ऐसा आजतक ना ही कभी देखा गया ।

डर रहे हैं देख अब- जब खाँसता हैं आदमी ।।


मौन होकर सब तमाशा देखते हैं आज तो ।

मौत से जब हर घड़ी वो काँपता हैं आदमी ।।


रोग ने तो संग साथी दूर देखो कर दिया ।

दूर से ही अब कफ़न तो नापता हैं आदमी ।।


                        ©विपिन"बहार"

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